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फंदे पर लटकाए जाने के दो घंटे तक जिंदा था रंगा: देश को दहला देने वाले ‘रंगा-बिल्ला’ हत्याकांड की खौफनाक दास्तां-

चीफ एडिटर एवं  रिपोर्टर – दिलीप जोशी (नेशनल टाइम न्यूज़)

दिल दहला देने वाला रंगा-बिल्ला हत्याकांड: एक खौफनाक अपराध, सख्त सज़ा की कहानी

एक बहन-भाई की हत्या ने हिला दिया देश

26 अगस्त 1978 की शाम दिल्ली के प्रतिष्ठित माउंट सेंट मेरी स्कूल की छात्रा 16 वर्षीय गीतांजलि ओबरॉय और उसका 14 वर्षीय भाई संजय ओबरॉय अपने स्कूल म्यूज़िक शो से घर लौट रहे थे। RK पुरम इलाके से लिफ्ट लेने के दौरान वे दो अनजान लोगों की कार में बैठे—उन दो लोगों के नाम थे रघुराज सिंह उर्फ़ रंगा और कुलजीत सिंह उर्फ़ बिल्ला

जो मासूम बच्चे एक साधारण सवारी समझकर कार में बैठे, वे नहीं जानते थे कि वे दो खूंखार अपराधियों के चंगुल में फँस चुके हैं।


अपराध की भयावहता: बलात्कार, हत्या और मासूमियत का अंत

रंगा और बिल्ला ने गीतांजलि के साथ कार में ही दुष्कर्म किया, दोनों बच्चों को बुरी तरह पीटा और उन्हें चाकुओं से गोदकर निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया। शवों को जंगल में फेंक दिया गया।

यह घटना मात्र अपहरण या हत्या नहीं थी, यह पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला अपराध था, जिसने दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।


कैसे पकड़े गए रंगा-बिल्ला: पुलिस की मुस्तैदी ने दिलाया न्याय

जैसे ही बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज हुई, दिल्ली पुलिस की टीमें सक्रिय हो गईं। कुछ ही दिनों में बच्चों के शव मिले। पुलिस ने टेक्निकल सुरागों के आधार पर कार की पहचान की और फिर अपराधियों की तलाश शुरू हुई।

मुंबई में छिपे रंगा और बिल्ला को रेडियो इंटरव्यू के माध्यम से पहचाना गया। दोनों फिल्मी दुनिया में काम पाने की कोशिश कर रहे थे और जब उन्होंने अपने नाम छुपा कर इंटरव्यू दिया, तब एक श्रोता ने उनकी आवाज पहचान ली। यह सूचना तुरंत पुलिस को दी गई और दोनों को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया।


पुलिस जांच और अदालत की कार्रवाई: नज़ीर बन गया ये मामला

पुलिस जांच में यह स्पष्ट हुआ कि रंगा और बिल्ला पहले से ही कई आपराधिक मामलों में शामिल थे। दिल्ली की अदालत में दोनों के खिलाफ केस चला। सबूतों और गवाहों के आधार पर उन्हें बलात्कार, अपहरण और हत्या के अपराध में मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई।


फांसी की सज़ा: कानून ने दिखाई सख्ती

31 जनवरी 1982 को तिहाड़ जेल में रंगा और बिल्ला को फांसी पर चढ़ाया गया।
लेकिन एक चौंकाने वाली बात यह सामने आई—
रंगा फांसी पर लटकाए जाने के दो घंटे बाद तक जिंदा था, जबकि बिल्ला की मौत जल्दी हो गई थी। यह तथ्य जेल के पोस्टमॉर्टम में सामने आया और इसने फांसी की प्रक्रिया पर भी बहस छेड़ दी।


निष्कर्ष: अपराध का अंत, लेकिन सबक बना देश के लिए

रंगा-बिल्ला केस भारत के न्यायिक इतिहास का वो काला अध्याय है जिसने देश को यह बताया कि जघन्य अपराधों के खिलाफ कानून कितना सख्त हो सकता है। इस केस के बाद देश भर में बच्चों की सुरक्षा, लिफ्ट देने के चलन और अपराधियों की पहचान जैसे कई मुद्दों पर सामाजिक बहस छिड़ी।

यह हत्याकांड आज भी भारत के सबसे भयानक क्राइम केस के रूप में याद किया जाता है।

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