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जासमा में विकास के दावों की खुली पोल! 7 साल से सरपंच की कुर्सी, फिर भी गांव गंदगी में बेहाल—नालियां जाम, सड़कों पर गंदा पानी, हजारों लीटर पानी रोज बर्बाद..

रिपोर्टर: पवन कुमार सोनी (नेशनल टाइम न्यूज)

ग्रामीणों का सीधा सवाल—जब सफाई के लिए बजट आता है तो गांव की हालत ऐसी क्यों? प्रशासन कब मांगेगा जवाब?

जासमा। ग्राम पंचायत जासमा में सफाई व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं की बदहाली को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सामने आने लगा है। पहले भी गांव की गंदगी, जाम नालियों, सड़कों पर बहते गंदे पानी और खराब मार्गों को लेकर सवाल उठ चुके हैं, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि हालात में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा।

ग्रामीणों का कहना है कि सरपंच देवी लाल जी को जिस उम्मीद और विश्वास के साथ करीब सात वर्ष पहले गांव की कमान सौंपी गई थी, आज वही ग्रामीण अपने मूलभूत सवालों के जवाब मांग रहे हैं।

“नया सरपंच आएगा, वह काम करवाएगा”—तो फिर वर्तमान जिम्मेदारी किसकी?

ग्रामीणों के अनुसार जब गांव की समस्याओं को लेकर जिम्मेदारों से सवाल किया जाता है तो उन्हें भविष्य के सरपंच के भरोसे छोड़ने जैसी बातें सामने आती हैं।

ग्रामीणों का सवाल सीधा है—

जब वर्तमान में जिम्मेदारी आपकी है, तो समस्याओं का समाधान अगला सरपंच क्यों करेगा?

अगर सात वर्षों में भी गांव की नालियां साफ नहीं हो पाईं, गंदे पानी की निकासी नहीं हो पाई और सड़कों की स्थिति नहीं सुधरी तो फिर ग्रामीण आखिर किसके पास अपनी समस्या लेकर जाएं?

सफाई के नाम पर लाखों का बजट, फिर गांव में गंदगी का अंबार क्यों?

ग्रामीणों के अनुसार गांव की सफाई व्यवस्था के लिए हर वर्ष करीब 12 लाख रुपये तक का बजट आने की बात कही जा रही है।

अगर यह राशि वास्तव में सफाई कार्यों पर खर्च हो रही है, तो ग्रामीणों का सवाल बेहद गंभीर है—

फिर जासमा की गलियों में गंदगी क्यों है?
नालियां जाम क्यों हैं?
गंदा पानी सड़कों पर क्यों बह रहा है?
कीचड़ और कचरे से ग्रामीण परेशान क्यों हैं?

अब ग्रामीण केवल आश्वासन नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि पिछले वर्षों में सफाई के नाम पर खर्च हुई राशि का पूरा हिसाब सामने आए।

कहां पैसा खर्च हुआ? किस काम पर खर्च हुआ? किसे भुगतान किया गया? कितने दिन सफाई कार्य हुआ? कितने कर्मचारी लगाए गए? और मौके पर उसका परिणाम कहां है?

20 साल से सवाल वही—सरपंच बदलते रहे, गांव की हालत क्यों नहीं बदली?

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब दो दशकों से पंचायत में अलग-अलग सरपंच आते रहे, लेकिन गांव की मूलभूत समस्याएं आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुईं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच बदलते रहे, लेकिन गांव की तस्वीर नहीं बदली। यदि पंचायत के रिकॉर्ड में विकास और सफाई के कार्य पूरे दिखाए गए हैं, तो मौके पर उनकी वास्तविक स्थिति भी प्रशासन को सार्वजनिक करनी चाहिए।

प्रधानमंत्री का “जल बचाओ” संदेश, जासमा में पानी की बर्बादी पर कौन जिम्मेदार?

एक तरफ देश में जल संरक्षण को लेकर लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं और दूसरी तरफ जासमा में पानी की व्यवस्था में लापरवाही के कारण प्रतिदिन हजारों लीटर पानी व्यर्थ बह रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ स्थानों पर 24 घंटे में 5,000 लीटर से भी अधिक पानी बर्बाद होने की स्थिति बन रही है। अगर यह स्थिति मौके की जांच में सही पाई जाती है तो सवाल और भी बड़ा है—

क्या पंचायत प्रशासन को यह दिखाई नहीं देता?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी मौके पर जाकर निरीक्षण किया?
और अगर जानकारी है, तो सुधार क्यों नहीं किया गया?

सचिव और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में

ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत सचिव और संबंधित अधिकारियों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

सरकारी कर्मचारी वेतन लेते हैं तो उनके ऊपर पंचायत की प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी भी होती है। यदि गांव की समस्याओं की लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो संबंधित अधिकारियों को मौके पर पहुंचकर स्थिति की जांच करनी चाहिए।

ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि किसी कर्मचारी या अधिकारी की संपत्ति, आय अथवा कार्यप्रणाली को लेकर शिकायत है तो सक्षम विभाग द्वारा नियमानुसार जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए।

और सबसे बड़ा सवाल—

“आखिर जासमा के ग्रामीणों को कब मिलेगा गंदगी से छुटकारा और विकास का वास्तविक लाभ?”

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। अगर रिकॉर्ड में काम हुए हैं तो प्रशासन उन्हें जनता के सामने रखे और अगर काम नहीं हुए हैं तो जिम्मेदारी तय करे।

जनता के पैसे का हिसाब जनता को मिलना चाहिए। जासमा को केवल कागजों में विकसित दिखाने से नहीं, बल्कि जमीन पर साफ-सुथरा और व्यवस्थित बनाकर ही विकास साबित होगा।

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